इंडियन नेटिविज़्म :१ जनुअरी नेटिव वारियर्स डे और इंडियन नेटिविज़्म डे इंडियन नेटिविज़्म , भारतीय नेटिविज़्म , हिंदुस्तानी नेटिविज़्म को १ जनुअरी २019 को ४७ साल होंगे। नेटिविस्ट डी डी राउत ने सं १९७३ के १ जनुअरी को बौद्धिक मंडल , शुक्रवारी वार्ड , पौनी , जिल्हा भंडारा , महाराष्ट्र में अपने कुछ युवा साथी के साथ इस मंडल का काम सँभालने के बाद जाती और वर्ण वेवस्था और गुलामी के खिलाफ लड़ने के लिए नेटिविज़्म और नेटिव हिंदुत्व पर अपना छोटासा सम्बोधन अपने साथी युवा कार्यकर्ता को किया था इन युवावो में विनायक मेश्राम , लीलाधर गजभिये , कमलाकर रामटेके आदि थे। विदेशी ब्राह्मण और उनका वैदिक ब्राह्मण धर्म हमारे लिए , देश के लिए हानिकारक है , ब्राह्मण हिन्दू नहीं है , हिन्दू धर्म और ब्राह्मण धर्म अलग अलग है ये बात सुनाने के बाद युवावो ने ब्रह्मिनो के कुवमे थूकने का निर्णय किया था और कुछ ऐसे कुवो में हम युवक थूके थे। यह वर्णवाद , छुवाछुत , अस्पृश्यता आदि विदेशी वैदिक ब्राह्मण धर्म के खिलाफ विद्रोह था। तब हम नहीं यही कोई २० -२५ साल के युवा थे और हमारी समज में विदेशी ब्रह्मिनो के कुवो में थूकना बड़ी बहादुरी थ...
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Showing posts from December, 2018
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विनंती संजय कोकरे ओबीसी एनटी पार्टी , शिवश्री खेडेकर शिव राज्य पक्ष , प्रकाश आंबेडकर, रामदास आठवले, जोगेंद्र कवाडे, सुरेश माने, शाम गायकवाड, सुनील खोब्रागडे, जितेंद्र राऊत, कपिल सरोदे , बिडी बोरकर , विजय मानकर , इंदिसे आदी सर्व रिपब्लिकन गट मान्यवर याना नेटिविस्ट डी डी राऊत , संयोजक , नेटिव्ह - सेकुलर - रिपब्लिकन फ्रंट चे सादर फेस बुक वरून सार्वजनिक निमंत्रण फ्रंट च्या दिनांक २० जानेवारी , २०१८ रोजी कल्याण बैठकीला यावे हि विनंती . आपला नम्र : नेटविस्ट डी डी राऊत , अध्यक्ष , नेटिव्ह पीपल्स पार्टी , संयोजक , नेटिव्ह सेकुलर रिपब्लिकन फ्रंट .
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नया साल मुबारक ! साँस है तो आस है जीवन का मधुमास है अनबुझी प्यास है प्यारा प्यारा सहवास है जब तक सांस है प्यारे तू क्यों उदास है आने वाला है नया साल नयी बोतल नया ग्लास है फिर कसरत करनी है दंड बैठक लगाना है ब्रह्मिनो से टकराना है ब्राह्मणवाद मिटाना है जब तक सांस है हमारी तो यही आस है आये नेटिव हिंदुत्व का राज यही हमारे सांस का काज है # जनसेनानी कल्याण १ जेनुअरी ,२०१९ नया साल मुबारक !
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हम बार बार हिन्दू धर्म और ब्राह्मण धर्म अलग अलग है कहते रहेंगे , आपको पसंद आये या ना आये ! हिन्दू धर्म और ब्राह्मण धर्म अलग अलग है फिर विदेशी वैदिक ब्राह्मण धर्मी ब्राह्मण हिन्दू धर्म में ब्राह्मण बन कर क्यों आना चाहते है ? क्या है उनका मकसद ? क्यों निहि वो छोड़ देते है वैदिक वर्णवादी , जातिवादी , भेदभाव वादी , ऊंचनीच वादी, रेपिस्ट , चारित्र्य हिन् वैदिक ब्राह्मण गाड्स जैसे ब्रह्मा , विष्णु , इंद्रा , सोम , रूद्र इत्यादि और वो ३ प्रतिशत विदेशी ब्राह्मण क्यों नहीं होना चाहते है सत्य हिन्दू धर्मी जहा वेद भेद नहीं है , जनेऊ , होम हवन नहीं है ! इसका कारण बच्चा बच्चा भी जानता है क्यों जी वे अलग धर्म के है जिनका धर्म वेद , भेद , मदिर, मॉस, मैथुन , मुफ्तखोरी पर आधारित है। ये सब को कैसे छोड़ सकते है ? हिन्दू धर्म बहुत सरल और सुन्दर है वो धर्मात्मा कबीर ने अपनी वाणी बीजक में बहुत ही सुन्दर और गेय तरीकेसे बताया है वो भजन , गीत में भी आसानी से जन जन में बहुत ही पॉपुलर है , पुरे विश्वमे करोडो लोग उसे भजन के माध्यमसे भी सुनते है , उसका आचरण करते है। यह सत्य हिन्दू धर...
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१८५७ का विद्रोह हमारा पहला स्वातंत्र्य संग्राम नहीं वो तो विदेशियोंके साथ विदेशियोंकी लड़ाई थी। १८५७ के विद्रोह को हिंदुस्तान का पहला स्वात्यंत्र संग्राम कहा जाता है पर इसे हिन्दुस्तान के स्वतंत्रता की लड़ाई नहीं मान सकते क्यों की यह लड़ाई विदेशी मुग़ल और विदेशी वैदिक धर्मी ब्राह्मण अपने लिए लड़ रहे थे हिन्दुतान या नेटिव हिन्दू के लिए नहीं। हम ये कभी भूल नहीं सकते की वैदिक धर्मी ब्राह्मण भी मुघलो की तरह ही विदेशी है जैसे विदेशी ब्रिटिश। दिल्ली का बादशाह जाफर शाह कोई नेटिव नहीं था नाही झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, पेशवा नाना या तात्या टोपे। ये सब विदेशी थे जो यहाँ पर आक्रमण कर शाशक बन बैठे थे। ग्वालियर के सिंधिया ने ठीक ही किया था जो वर्णवादी वैदिक ब्राह्मण धर्मी लक्ष्मीबाई को अपने यहाँ रुकने नहीं दिया नहीं इसलिए सभी हिन्दू सिंधिया के आभारी है। हम यहाँ एक बात अवश्य कहना चाहते है महाराणा रंजीत सिंह ने जरूर नेटिव हिन्दू और हिंदुस्तान के लिए ब्रिटिश कंपनी से नेटिव स्वतंत्रता के लिए सग्राम किया था। कंपनी सरकार जाने के बाद ब्रिटिश...
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कबीरांनी सांगितलेला बिन पैस्याचा सत्य हिंदू धर्म स्वीकारा ! आज जो तो उठतो , गेरुवे , भगवे कपडे घालतो आणि धर्माच्या नांवांनी मागत सुटतो आणि मागतो तरी काय तर पैसा , पाचशे , हजार , दोन हजार , पाच हजार , दहा हजार , एक लाख . एवढ्या पेक्षा कमी देऊ नका असे सुद्धा सांगायला कमी करत नाही जणू काही धर्म यांचे शिवाय आणि पैस्या शिवाय जिवंत राहू शकत नाही कि तुम्ही यांच्या धर्म शिवाय जीवन जगू शकत नाही . धर्म म्हणजे पाठांतर , दोन चार विधी असे आता झाले आहे . नीतिमता म्हणजे धर्म हा विचार आज मागे पडला आहे तर पैसे देणे हाच धर्म झाला आहे . हे सर्व बंद करायचे असेल तर आम्ही म्हंतो बिन पैश्याचा धर्मात्मा कबीरांचा सत्य हिंदू धर्म स्वीकारा . धर्म आचरण वैयक्तिक सुचिता आहे म्हणजे स्वतःला पाप कार्य पासून दूर ठेवून जीवन जगणे होय . कबीरांनी कोणाकडूनही एक पैसे स्वीकारला नाही उलट ते आलेल्या पाहुण्यांचे स्वतःच्या अर्जित पैश्यातून पाहुणचार करीत असत . कशी च्या राजा अनेकदा त्यांच्या कडे धार्मिक विचार ऐकायला येत असत , मौल्यवान हिरे , सोने , जवाहीर ते भेट देऊ इच्छित पण कबीरांनी ते अ...
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लोकशाही और समाज में एक से अधिक धर्म अस्तित्व में होना इस स्थितिमे धर्म निरपेक्षता अनिवार्य हो जाती है। जब तक संसारमे राजशाही थी तब तक जो धर्म राजा का वही धर्म प्रजा का माना जाता रहा है। विदेशी वैदिक धर्मी ब्राह्मण जब तक हिन्दुतान में नहीं घुसे थे तब तक यहाँके लोगो का एक मात्र धर्म था हिन्दू धर्म और सभी राजा हिन्दू ही थे। विदेशी ब्राह्मण उनके वैदिक ब्राह्मण धर्म के साथ आने के बाद धर्म की संख्या एक से बढ़ कर दो हो गयी पर तब भी राजा हिन्दू ही थे और जनता भी हिन्दू ही। केवल विदेशी ब्राह्मण वैदिक ब्राह्मण धर्मी थे और उन्हों ने अपने शुध्द रक्त बचावो आंदोलन के अंतर्गत अपने ब्राह्मण समाज जो बहुत ही काम था शयद एक आधा टक्का नेटिव समाज नेटिव हिन्दू धर्म से दूर रखा। विदेशी ब्राह्मण होम हवन करतेथे , जनेऊ धारण करते थे पर भोजन हिन्दू जैसा ही रहा होगा और परिधान भी हिन्दू जैसेhi धारण किये होंगे। पर वो हमें छुवो नहीं कहते थे जिस से विदेशी ब्राह्मण और हिन्दू धर्म और संस्कृति से अलग अलग बने रहे। पर विदेशी ब्राह्मण ज्यादा दिन हिन्दू से दूर नहीं रह...